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Tuesday, 16 August 2022

सूर्य की उपासना मंत्र एवं सूर्य किरण माहिती स्त्रोत

सूर्य उपासना प्रात: स्मरण।

प्रात: स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यम
रूपं हि मण्डल मृचोऽथ तनुर्यजूंषि |  
सामानि यस्य किरणा: प्रभवादि हेतुं ब्रम्हाहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम || १ ||

प्रातर्नमामी तरणिम तनुवांगमनोभि:  
ब्रम्हेन्द्रपूर्वकसुरैर्नुतमर्चितं च।  
वृष्टि-प्रमोचनविनी-गृहहेतुभूतं 
त्रैलोक्यपालनपरं त्रिगुणात्मकं च || २||

प्रातर्भजामी सवितारमनन्तशक्तिं पापौघशत्रुभयरोगहरं परं च |  
तं सर्वलोककल्नात्मककालमूर्तिं 
गोकंठबंधन विमोचनमादीदेवम || ३ ||  
  
  
  


सूर्य उपासना ध्यान मंत्र

ॐ आदित्याय नमः  
यं ब्रह्मावरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवैर्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः।।  
ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनोयस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणाः देवाय तस्मै नमः ||१||

ॐ आदित्याय नमः  
मूर्तित्वे परिकल्पितः शश भृतो वर्मापुनर्जन्मना मात्मेत्यात्म विदां क्रतुश्च यजतां भर्तामर ज्योतिषाम् |  
लोकानां प्रलयोद्भवस्थिति विभुः चानेकधायः श्रुतौवाचं नःसददात्वनेक किरणः त्रैलोक्यदीपो रविः ||२||

ॐ आदित्याय नमः  

भास्वान्काश्यपगोत्रजो रुणरुचिर्य: सिंहराशीश्वरः षट्विस्थो दश शोभनोगुरुशशी भौमेषु मित्रं सदा।  शुक्रो मन्दरिपुकलिंगजनितः चाग्नीश्वरो देवते मध्ये वर्तुलपूर्वदिग्दिनकर: कुर्यात् सदा मंगलम्।।३।।  
  



सूर्य उपासना अर्घ्य मंत्र

एहि सूर्य ! सहस्त्रांशो ! तेजोराशे ! जगत्पते |  
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणायँ नमोस्तुते ||

तापत्रयहरं दिव्यं परमानन्दलक्षणम् |  
तापत्रयविमोक्षाय तवायँ कल्प्याम्यहम् ||

नमो भगवते तुभ्यं नमस्ते जातवेदसे |  
दत्तमर्घ्य मया भानो ! त्वं गृहाण नमोस्तुते ||

अर्घ्यं गृहाण देवेश गन्धपुष्पाक्षतैः सह ।  
करुणां कुरु मे देव गृहाणायँ नमोस्तुते ||

नमोस्तु सूर्याय सहस्त्रभानवे नमोस्तु वैश्वानर- जातवेदसे |  
त्वमेव चार्घ्य प्रतिगृह्ण देव ! देवाधिदेवाय नमो नमस्ते ||  
  



सूर्य उपासना क्षमा प्रार्थना

उपसन्न्स्य दीनस्य प्रायश्चित्तकृताञ्जले: |  
शरणं च प्रपन्नस्य कुरुष्वाद्य दयां प्रभो ||

परत्र भयभीतस्य भग्नखंडव्रतस्य च |  
कुरु प्रसादं सम्पूर्णं व्रतं सम्पूर्णमस्तु में ||

यज्ञच्छीद्रम तपश्छिद्रं यच्छीद्रम पूजने मम |  
तत्सर्वमच्छीद्रमस्तु भास्करस्य प्रसादतः ||

  
  
  
रोचक विशेष बात सूर्य किरण की।

देेवी स्वाहा के अठारह नाम 1 से 18, और 19 से 26 जो नाम हैं वह सूर्य किरणों के नाम से जुड़े हुए हे।

 स्वाहा के नाम को भी सूर्य किरणों के नाम से जोड़ सकते है। यहाँ वही 26 से और भी नाम हो सकते है जो सूची में शामिल नही है।

1. स्वाहा, 
2. वह्निप्रिया, 
3. वह्निजाया, 
4. संतोषकारिणी,  
5. शक्ति, 
6. क्रिया, 
7. कालदात्री, 
8. परिपाककरी, 
9. ध्रुवा, 
10. गति, 
11. नरदाहिका, 
12. दहनक्षमा, 
13. संसारसाररूपा, 
14. घोरसंसारतारिणी, 
15. देवजीवनरूपा, 
16. देवपोषणकारिणी
17. दाहिका
18. तेजरूपा

19. उषा
20. सवर्णा
21. सवर्ण
22. सवर्णी
23. पिंगला
24. रन्ना
25. सावित्रु से सावित्री
26. रश्मि

स्त्री सम्मान की बात ही काफी नही होती। माँ को समझना चाहिए।

26 : 6-2=4 26th January 
15 : 5-1=4 15th August 

26 & 15 Both dates important for every indian, But 4th July is important to All American अतिक्रम से वापस आने में उलटे रास्ते कुछ बातें धंधे की भूलनी नही चाहिए की ग्राहक दूसरा आएगा तभी जब पहला वस्तु को अच्छा कहेगा।

भारत में यह कुछ अलग हिसाब से लिए जानी वाली बात ही की each child has if 1 and 2 means parent or any one of them, than no worries..
:

Jay Gurudev Dattatreya
Jay Hind
Jigaram JAIGISHYA Jigar
Jigar Gaurangbhai Mehta 

Every place in universe.. the biggest fire eating smaller fire.. survival truth..

Jay Gurudev Dattatreya
Jay Hind 


Monday, 5 July 2021

आदित्य हृदय स्तोत्रम मात्र

आदित्य हृदय स्तोत्रम मात्र

... सूर्य देव की प्रार्थना है । जो राम और रावण के साथ महायुद्ध से पहले सुनाई गई थी। 

इस प्रार्थना को महर्षि ऋषि अगस्त्य द्वारा सुनाई गयी थी। 

यह पूजन तब है जब आपकी राशि (जन्म कुंडली) में सूर्य ग्रहण लगा हो। इस परस्थिति में आपको अच्छे परिणाम के लिए पाठ अच्छा है।

आदित्य यानी जो अजीज (पासमे रहकर) आगे से हर हमेश रूपसे दिखाई देता है। नित्य है जो परम तेज।

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥ 01।।

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।
उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवान् ऋषिः॥ 02।।

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि॥ 03।।

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
जयावहं जपेन्नित्यम् अक्षय्यं परमं शिवम्॥ 04।।

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम
चिन्ताशोकप्रशमनम् आयुर्वर्धनमुत्तमम्॥ 05।।

रश्मिमंतं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्॥ 06।।

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः॥ 07।।

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः॥ 08।।

पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः।
वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः॥ 09।।

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः॥ 10।।

हरिदश्वः सहस्रार्चि: सप्तसप्ति-मरीचिमान।
तिमिरोन्मन्थन: शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान॥ 11।।

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः।
अग्निगर्भोsदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशान:॥ 12।।

व्योम नाथस्तमोभेदी ऋग्य जुस्सामपारगः।
धनवृष्टिरपाम मित्रो विंध्यवीथिप्लवंगम:॥ 13।।

आतपी मंडली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः।
कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भव:॥ 14।।

नक्षत्रग्रहताराणा-मधिपो विश्वभावनः।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोस्तुते॥ 15।।

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रए नमः।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः॥ 16।।

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाए नमो नमः।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥ 17।।

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः।
नमः पद्मप्रबोधाय मार्तण्डाय नमो नमः॥ 18।।

ब्रह्मेशानाच्युतेषाय सूर्यायादित्यवर्चसे।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥ 19।।

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषाम् पतये नमः॥ 20।।

तप्तचामिकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे।
नमस्तमोsभिनिघ्नाये रुचये लोकसाक्षिणे॥ 21।।

नाशयत्येष वै भूतम तदेव सृजति प्रभुः।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः॥ 22।।

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।
एष एवाग्निहोत्रम् च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम॥ 23।।

वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनाम फलमेव च।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः॥ 24।।

एन मापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
कीर्तयन पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव॥ 25।।

पूज्यस्वैन-मेकाग्रे देवदेवम जगत्पतिम।
एतत त्रिगुणितम् जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि॥ 26।।

अस्मिन क्षणे महाबाहो रावणम् तवं वधिष्यसि।
एवमुक्त्वा तदाsगस्त्यो जगाम च यथागतम्॥ 27।।

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोsभवत्तदा।
धारयामास सुप्रितो राघवः प्रयतात्मवान ॥ 28।।

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परम हर्षमवाप्तवान्।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान॥ 29।।

रावणम प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत।
सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोsभवत्॥ 30।।

अथ रवि-रवद-न्निरिक्ष्य रामम। 
मुदितमनाः परमम् प्रहृष्यमाण:।
निशिचरपति-संक्षयम् विदित्वा सुरगण-मध्यगतो वचस्त्वरेति॥ 31।।


मनुष्य के अंधकार युक्त श्री शरीर देह में आत्मा पूंज की ज्योति की विषम प्रज्ञा को चैतन्यमय बनाए। 

जय गुरुदेव दत्तात्रेय। 

जय हिंद।

जिगरम जैगिष्य जिगर:

आदित्य हृदय स्तोत्रम एवम भावानुवाद

आदित्य हृदय स्तोत्रम एवम भावानुवाद

आदित्य हृदय स्तोत्र – भगवान सूर्य देव की प्रार्थना है । जो राम और रावण के साथ महायुद्ध से पहले सुनाई गई थी। इस प्रार्थना को महर्षि ऋषि अगस्त्य द्वारा सुनाई गयी थी। यह पूजन तब है जब आपकी राशि (जन्म कुंडली) में सूर्य ग्रहण लगा हो। इस परस्थिति में आपको अच्छे परिणाम के लिए, नियमित रूप से कर्मकाण्ड (पाठ,व्रत हवन आदि) करने होंगे। आदित्य हृदय स्तोत्र मन की शांति, आत्मविश्वास और समृद्धि देता है। इस प्रार्थना के पाठ से जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं। आदित्य हृदय स्तोत्र पूजा विधि से अनगिनत लाभ होते हैं। जिसके लिए आदित्य हृदय स्तोत्र के जप, पूजा पाठ हवन और व्रत रखे जाते हैं।

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥ 01
उधर श्रीरामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिंता करते हुए रणभूमि में खड़े हुए थे। इतने में रावण भी युद्ध के लिए उनके सामने उपस्थित हो गया।

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवान् ऋषिः॥ 02
यह देख भगवान् अगस्त्य मुनि, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने के लिए आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले।

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्।येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि॥ 03
सबके ह्रदय में रमन करने वाले महाबाहो राम! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो! वत्स! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा जाओगे ।

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।जयावहं जपेन्नित्यम् अक्षय्यं परमं शिवम्॥ 04
इस गोपनीय स्तोत्र का नाम है ‘आदित्यहृदय’ । यह परम पवित्र और संपूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसके जप से सदा विजय कि प्राप्ति होती है। यह नित्य अक्षय और परम कल्याणमय स्तोत्र है।

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।चिन्ताशोकप्रशमनम् आयुर्वर्धनमुत्तमम्॥ 05
सम्पूर्ण मंगलों का भी मंगल है। इससे सब पापों का नाश हो जाता है। यह चिंता और शोक को मिटाने तथा आयु का बढ़ाने वाला उत्तम साधन है।

रश्मिमंतं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्॥ 06
भगवान् सूर्य अपनी अनंत किरणों से सुशोभित हैं । ये नित्य उदय होने वाले, देवता और असुरों से नमस्कृत, विवस्वान नाम से प्रसिद्द, प्रभा का विस्तार करने वाले और संसार के स्वामी हैं । तुम इनका रश्मिमंते नमः, समुद्यन्ते नमः, देवासुरनमस्कृताये नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः, भुवनेश्वराये नमः इन मन्त्रों के द्वारा पूजन करो।

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः॥ 07
संपूर्ण देवता इन्ही के स्वरुप हैं । ये तेज़ की राशि तथा अपनी किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले हैं । ये अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरों सहित समस्त लोकों का पालन करने वाले हैं ।

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः॥ 08
भगवान सूर्य, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, महेंद्र, कुबेर, काल, यम, सोम एवं वरुण आदि में भी प्रचलित हैं।

पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः।वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः॥ 09
ये ही ब्रह्मा, विष्णु शिव, स्कन्द, प्रजापति, इंद्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरुण, पितर , वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुदगण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को प्रकट करने वाले तथा प्रकाश के पुंज हैं ।

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्।सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः॥ 10
इनके नाम हैं आदित्य(अदितिपुत्र), सविता(जगत को उत्पन्न करने वाले), सूर्य(सर्वव्यापक), खग, पूषा(पोषण करने वाले), गभस्तिमान (प्रकाशमान), सुवर्णसदृश्य, भानु(प्रकाशक), हिरण्यरेता(ब्रह्मांड कि उत्पत्ति के बीज), दिवाकर(रात्रि का अन्धकार दूर करके दिन का प्रकाश फैलाने वाले),

हरिदश्वः सहस्रार्चि: सप्तसप्ति-मरीचिमान।तिमिरोन्मन्थन: शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान॥ 11
हरिदश्व, सहस्रार्चि (हज़ारों किरणों से सुशोभित), सप्तसप्ति(सात घोड़ों वाले), मरीचिमान(किरणों से सुशोभित), तिमिरोमंथन(अन्धकार का नाश करने वाले), शम्भू, त्वष्टा, मार्तण्डक(ब्रह्माण्ड को जीवन प्रदान करने वाले), अंशुमान,

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः।अग्निगर्भोsदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशान:॥ 12
हिरण्यगर्भ(ब्रह्मा), शिशिर(स्वभाव से ही सुख प्रदान करने वाले), तपन(गर्मी पैदा करने वाले), अहस्कर, रवि, अग्निगर्भ(अग्नि को गर्भ में धारण करने वाले), अदितिपुत्र, शंख, शिशिरनाशन(शीत का नाश करने वाले),

व्योम नाथस्तमोभेदी ऋग्य जुस्सामपारगः।धनवृष्टिरपाम मित्रो विंध्यवीथिप्लवंगम:॥ 13
व्योमनाथ(आकाश के स्वामी), तमभेदी, ऋग, यजु और सामवेद के पारगामी, धनवृष्टि, अपाम मित्र (जल को उत्पन्न करने वाले), विंध्यवीथिप्लवंगम (आकाश में तीव्र वेग से चलने वाले),

आतपी मंडली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः।कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भव:॥ 14
आतपी, मंडली, मृत्यु, पिंगल(भूरे रंग वाले), सर्वतापन(सबको ताप देने वाले), कवि, विश्व, महातेजस्वी, रक्त, सर्वभवोद्भव (सबकी उत्पत्ति के कारण),

नक्षत्रग्रहताराणा-मधिपो विश्वभावनः।तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोस्तुते॥ 15
नक्षत्र, ग्रह और तारों के स्वामी, विश्वभावन(जगत कि रक्षा करने वाले), तेजस्वियों में भी अति तेजस्वी और द्वादशात्मा हैं। इन सभी नामो से प्रसिद्द सूर्यदेव ! आपको नमस्कार है।

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रए नमः।ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः॥ 16
पूर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरी अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है । ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों) के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है।

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाए नमो नमः।नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥ 17
आप जयस्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता हैं। आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते हैं। आपको बारबार नमस्कार है। सहस्रों किरणों से सुशोभित भगवान् सूर्य! आपको बारम्बार प्रणाम है। आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से भी प्रसिद्द हैं, आपको नमस्कार है।

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः।नमः पद्मप्रबोधाय मार्तण्डाय नमो नमः॥ 18
उग्र, वीर, और सारंग सूर्यदेव को नमस्कार है । कमलों को विकसित करने वाले प्रचंड तेजधारी मार्तण्ड को प्रणाम है।

ब्रह्मेशानाच्युतेषाय सूर्यायादित्यवर्चसे।भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥ 19
आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी स्वामी है । सूर आपकी संज्ञा है, यह सूर्यमंडल आपका ही तेज है, आप प्रकाश से परिपूर्ण हैं, सबको स्वाहा कर देने वाली अग्नि आपका ही स्वरुप है, आप रौद्ररूप धारण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है।

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषाम् पतये नमः॥ 20
आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक, जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले हैं । आपका स्वरुप अप्रमेय है । आप कृतघ्नों का नाश करने वाले, संपूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है।

तप्तचामिकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे।नमस्तमोsभिनिघ्नाये रुचये लोकसाक्षिणे॥ 21
आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के समान है, आप हरी और विश्वकर्मा हैं, तम के नाशक, प्रकाशस्वरूप और जगत के साक्षी हैं, आपको नमस्कार है।

नाशयत्येष वै भूतम तदेव सृजति प्रभुः।पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः॥ 22
रघुनन्दन! ये भगवान् सूर्य ही संपूर्ण भूतों का संहार, सृष्टि और पालन करते हैं । ये अपनी किरणों से गर्मी पहुंचाते और वर्षा करते हैं।

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।एष एवाग्निहोत्रम् च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम॥ 23
ये सब भूतों में अन्तर्यामी रूप से स्थित होकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते हैं । ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री पुरुषों को मिलने वाले फल हैं।

वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनाम फलमेव च।यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः॥ 24
वेदों, यज्ञ और यज्ञों के फल भी ये ही हैं। संपूर्ण लोकों में जितनी क्रियाएँ होती हैं उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ हैं।

एन मापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।कीर्तयन पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव॥ 25
राघव! विपत्ति में, कष्ट में, दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्यदेव का कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं भोगना पड़ता।

पूज्यस्वैन-मेकाग्रे देवदेवम जगत्पतिम।एतत त्रिगुणितम् जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि॥ 26
इसलिए तुम एकाग्रचित होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वर कि पूजा करो । इस आदित्यहृदय का तीन बार जप करने से तुम युद्ध में विजय पाओगे।

अस्मिन क्षणे महाबाहो रावणम् तवं वधिष्यसि।एवमुक्त्वा तदाsगस्त्यो जगाम च यथागतम्॥ 27
महाबाहो ! तुम इसी क्षण रावण का वध कर सकोगे। यह कहकर अगस्त्यजी जैसे आये थे वैसे ही चले गए।

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोsभवत्तदा।धारयामास सुप्रितो राघवः प्रयतात्मवान ॥ 28
उनका उपदेश सुनकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी का शोक दूर हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्धचित्त से आदित्यहृदय को धारण किया।

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परम हर्षमवाप्तवान्।त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान॥ 29
और तीन बार आचमन करके शुद्ध हो भगवान् सूर्य की और देखते हुए इसका तीन बार जप किया । इससे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ । फिर परम पराक्रमी रघुनाथ जी ने धनुष उठाकर

रावणम प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत।सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोsभवत्॥ 30
रावण की और देखा और उत्साहपूर्वक विजय पाने के लिए वे आगे बढे। उन्होंने पूरा प्रयत्न करके रावण के वध का निश्चय किया।

अथ रवि-रवद-न्निरिक्ष्य रामम। मुदितमनाः परमम् प्रहृष्यमाण:।निशिचरपति-संक्षयम् विदित्वा सुरगण-मध्यगतो वचस्त्वरेति॥ 31
उस समय देवताओं के मध्य में खड़े हुए भगवान् सूर्य ने प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजी की और देखा और निशाचरराज रावण के विनाश का समय निकट जानकर हर्षपूर्वक कहा – ‘रघुनन्दन! अब जल्दी करो’ । इस प्रकार भगवान् सूर्य कि प्रशंसा में कहा गया और वाल्मीकि रामायण के युद्ध काण्ड में वर्णित यह आदित्य हृदयम मंत्र संपन्न होता है।


मनुष्य के अंधकार युक्त श्री शरीर देह में आत्मा पूंज की ज्योति की विषम प्रज्ञा। 


जय गुरुदेव दत्तात्रेय। जय हिंद।




Jay Hind. 
ॐ मणि पद्मे हुम। જય ગુરુદેવ દત્તાત્રેય .

सूर्य आह्वाहन मंत्र उपासना

सूर्य आह्वाहन मंत्र उपासना

त्वं भानो जगतश्चक्षु स्त्वमात्मा सर्व देहिनाम् |
त्वं योनिः सर्वभूतानां त्वमाचार: क्रियावताम् ||

त्वं गति: सर्वसांख्यानां योगिनां त्वं परायणम् |
अनावृतार्गलद्वारं त्वं गतिस्त्वं मुमुक्षताम् ||

त्वया संधार्यते लोकस्त्वया लोक: प्रकाश्यते |
त्वया पवित्री क्रियते निर्व्याजं पाल्यते त्वया ||

मनूनां मनुपुत्राणां जगतो मानवस्य च |
मन्वन्तराणां सर्वेषामीश्वराणां त्वमीश्वरः ।।

ज्योतींषित्वयि सर्वाणी त्वं सर्व ज्योतिषां पति: |
त्वयि सत्यं च सत्त्वं च सर्वे भावाश्च सात्त्विका: ||

आवाह्येतं द्विभुजं दिनेशं सप्ताश्ववाहं धुमणिं ग्रहेषम |
सिन्दूरवर्णप्रतिमावभासं भजामि सूर्य कुलवृद्धिहेतोः ॥

सूर्य उपासना क्षमा प्रार्थना

सूर्य उपासना क्षमा प्रार्थना

उपसन्न्स्य दीनस्य प्रायश्चित्तकृताञ्जले: |  
शरणं च प्रपन्नस्य कुरुष्वाद्य दयां प्रभो ||

परत्र भयभीतस्य भग्नखंडव्रतस्य च |  
कुरु प्रसादं सम्पूर्णं व्रतं सम्पूर्णमस्तु में ||

यज्ञच्छीद्रम तपश्छिद्रं यच्छीद्रम पूजने मम |  
तत्सर्वमच्छीद्रमस्तु भास्करस्य प्रसादतः ||



सूर्य उपासना क्षमा प्रार्थना

उपसन्न्स्य दीनस्य प्रायश्चित्तकृताञ्जले: |  
शरणं च प्रपन्नस्य कुरुष्वाद्य दयां प्रभो ||

परत्र भयभीतस्य भग्नखंडव्रतस्य च |  
कुरु प्रसादं सम्पूर्णं व्रतं सम्पूर्णमस्तु में ||

यज्ञच्छीद्रम तपश्छिद्रं यच्छीद्रम पूजने मम |  
तत्सर्वमच्छीद्रमस्तु भास्करस्य प्रसादतः ||

सूर्य उपासना अर्घ्य मंत्र

सूर्य उपासना अर्घ्य मंत्र

एहि सूर्य ! सहस्त्रांशो ! तेजोराशे ! जगत्पते |  
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणायँ नमोस्तुते ||

तापत्रयहरं दिव्यं परमानन्दलक्षणम् |  
तापत्रयविमोक्षाय तवायँ कल्प्याम्यहम् ||

नमो भगवते तुभ्यं नमस्ते जातवेदसे |  
दत्तमर्घ्य मया भानो ! त्वं गृहाण नमोस्तुते ||

अर्घ्यं गृहाण देवेश गन्धपुष्पाक्षतैः सह ।  
करुणां कुरु मे देव गृहाणायँ नमोस्तुते ||

नमोस्तु सूर्याय सहस्त्रभानवे नमोस्तु वैश्वानर- जातवेदसे |  
त्वमेव चार्घ्य प्रतिगृह्ण देव ! देवाधिदेवाय नमो नमस्ते ||  

सूर्य उपासना ध्यान मंत्र

सूर्य उपासना ध्यान मंत्र

ॐ आदित्याय नमः  
यं ब्रह्मावरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवैर्वेदैः 
साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः।।  
ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो
यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणाः देवाय तस्मै नमः ||१||

ॐ आदित्याय नमः  
मूर्तित्वे परिकल्पितः शश भृतो वर्मापुनर्जन्मना 
मात्मेत्यात्म विदां क्रतुश्च यजतां भर्तामर ज्योतिषाम् |  
लोकानां प्रलयोद्भवस्थिति विभुः चानेकधायः श्रुतौ
वाचं नःसददात्वनेक किरणः त्रैलोक्यदीपो रविः ||२||

ॐ आदित्याय नमः  
भास्वान्काश्यपगोत्रजो रुणरुचिर्य: सिंहराशीश्वरः 
षट्विस्थो दश शोभनोगुरुशशी भौमेषु मित्रं सदा।
शुक्रो मन्दरिपुकलिंगजनितः चाग्नीश्वरो देवते 
मध्ये वर्तुलपूर्वदिग्दिनकर: कुर्यात् सदा मंगलम्।।३।।  

सूर्य उपासना प्रात: स्मरण

सूर्य उपासना प्रात: स्मरण।

प्रात: स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यम
रूपं हि मण्डल मृचोऽथ तनुर्यजूंषि |  
सामानि यस्य किरणा: प्रभवादि हेतुं ब्रम्हाहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम || १ ||

प्रातर्नमामी तरणिम तनुवांगमनोभि:  
ब्रम्हेन्द्रपूर्वकसुरैर्नुतमर्चितं च।  
वृष्टि-प्रमोचनविनी-गृहहेतुभूतं 
त्रैलोक्यपालनपरं त्रिगुणात्मकं च || २||

प्रातर्भजामी सवितारमनन्तशक्तिं 
पापौघशत्रुभयरोगहरं परं च |  
तं सर्वलोककल्नात्मककालमूर्तिं 
गोकंठबंधन विमोचनमादीदेवम || ३ ||  

सूर्य उपासना के स्मरण, ध्यान, अर्घ्य, क्षमा प्रार्थना, आह्वाहन मंत्र

यावच्चंद्रदिवाकरो लृ

सूर्य उपासना स्मरण, ध्यान, अर्घ्य च क्षमा प्रार्थनामंत्र, आह्वाहन

July 05, 2021

सूर्य उपासना प्रात: स्मरण।

प्रात: स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यम
रूपं हि मण्डल मृचोऽथ तनुर्यजूंषि |  
सामानि यस्य किरणा: प्रभवादि हेतुं ब्रम्हाहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम || १ ||

प्रातर्नमामी तरणिम तनुवांगमनोभि:  
ब्रम्हेन्द्रपूर्वकसुरैर्नुतमर्चितं च।  
वृष्टि-प्रमोचनविनी-गृहहेतुभूतं 
त्रैलोक्यपालनपरं त्रिगुणात्मकं च || २||

प्रातर्भजामी सवितारमनन्तशक्तिं 
पापौघशत्रुभयरोगहरं परं च |  
तं सर्वलोककल्नात्मककालमूर्तिं 
गोकंठबंधन विमोचनमादीदेवम || ३ ||  
  
  
  

सूर्य उपासना ध्यान मंत्र

ॐ आदित्याय नमः  
यं ब्रह्मावरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवैर्वेदैः 
साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः।।  
ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो
यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणाः देवाय तस्मै नमः ||१||

ॐ आदित्याय नमः  
मूर्तित्वे परिकल्पितः शश भृतो वर्मापुनर्जन्मना 
मात्मेत्यात्म विदां क्रतुश्च यजतां भर्तामर ज्योतिषाम् |  
लोकानां प्रलयोद्भवस्थिति विभुः चानेकधायः श्रुतौ
वाचं नःसददात्वनेक किरणः त्रैलोक्यदीपो रविः ||२||

ॐ आदित्याय नमः  
भास्वान्काश्यपगोत्रजो रुणरुचिर्य: सिंहराशीश्वरः 
षट्विस्थो दश शोभनोगुरुशशी भौमेषु मित्रं सदा।
शुक्रो मन्दरिपुकलिंगजनितः चाग्नीश्वरो देवते 
मध्ये वर्तुलपूर्वदिग्दिनकर: कुर्यात् सदा मंगलम्।।३।।  
  

सूर्य उपासना अर्घ्य मंत्र

एहि सूर्य ! सहस्त्रांशो ! तेजोराशे ! जगत्पते |  
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणायँ नमोस्तुते ||

तापत्रयहरं दिव्यं परमानन्दलक्षणम् |  
तापत्रयविमोक्षाय तवायँ कल्प्याम्यहम् ||

नमो भगवते तुभ्यं नमस्ते जातवेदसे |  
दत्तमर्घ्य मया भानो ! त्वं गृहाण नमोस्तुते ||

अर्घ्यं गृहाण देवेश गन्धपुष्पाक्षतैः सह ।  
करुणां कुरु मे देव गृहाणायँ नमोस्तुते ||

नमोस्तु सूर्याय सहस्त्रभानवे नमोस्तु वैश्वानर- जातवेदसे |  
त्वमेव चार्घ्य प्रतिगृह्ण देव ! देवाधिदेवाय नमो नमस्ते ||  
  

सूर्य उपासना क्षमा प्रार्थना

उपसन्न्स्य दीनस्य प्रायश्चित्तकृताञ्जले: |  
शरणं च प्रपन्नस्य कुरुष्वाद्य दयां प्रभो ||

परत्र भयभीतस्य भग्नखंडव्रतस्य च |  
कुरु प्रसादं सम्पूर्णं व्रतं सम्पूर्णमस्तु में ||

यज्ञच्छीद्रम तपश्छिद्रं यच्छीद्रम पूजने मम |  
तत्सर्वमच्छीद्रमस्तु भास्करस्य प्रसादतः ||

सूर्य आह्वाहन मंत्र उपासना

त्वं भानो जगतश्चक्षु स्त्वमात्मा सर्व देहिनाम् |
त्वं योनिः सर्वभूतानां त्वमाचार: क्रियावताम् ||

त्वं गति: सर्वसांख्यानां योगिनां त्वं परायणम् |
अनावृतार्गलद्वारं त्वं गतिस्त्वं मुमुक्षताम् ||

त्वया संधार्यते लोकस्त्वया लोक: प्रकाश्यते |
त्वया पवित्री क्रियते निर्व्याजं पाल्यते त्वया ||

मनूनां मनुपुत्राणां जगतो मानवस्य च |
मन्वन्तराणां सर्वेषामीश्वराणां त्वमीश्वरः ।।

ज्योतींषित्वयि सर्वाणी त्वं सर्व ज्योतिषां पति: |
त्वयि सत्यं च सत्त्वं च सर्वे भावाश्च सात्त्विका: ||

आवाह्येतं द्विभुजं दिनेशं सप्ताश्ववाहं धुमणिं ग्रहेषम |
सिन्दूरवर्णप्रतिमावभासं भजामि सूर्य कुलवृद्धिहेतोः ॥

जिगरम जयगिष्य जिगर:

जय हिन्द च जय गुरुदेव दत्तात्रेय च जय हिन्द